इमाम-ए-ज़माना ने इस ज़ीयारत के माध्यम से अपने दादा इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति अपनी गहरी संवेदना और दुःख को प्रकट किया है।
"आप अकेले थे, न कोई मददगार था, न कोई मदद करने वाला। आपने अपने पवित्र कंठ से पानी मांगा, लेकिन जालिमों ने आपको शहादत का जाम पिला दिया।"
इमाम (अ.ज.) ये एहसास दिलाते हैं कि अगर वो मौजूद होते तो कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स.) की मदद को जरूर आते। ziyarat e nahiya in hindi
"अस्सलामू अला आदमा सफ़वतिल्लाह मिन ख़लकिह, अस्सलामू अला नूहिन मुजीबति दा'वतिह, अस्सलामू अला इब्राहीम ख़लीलिल्लाह..."
यह ज़ियारत मुख्य रूप से के दिन पढ़ी जाती है, लेकिन अकीदतमंद इसे साल भर किसी भी समय पढ़ सकते हैं。यह इमाम हुसैन (अ.) की शहादत का एक जीता-जागता और विस्तृत ऐतिहासिक दस्तावेज़ है。 न कोई मददगार था
इस ज़ियारत का पूरा पाठ इस प्रकार है:
"सलाम हो उस पर जिसकी बेबसी पर आसमान के फरिश्तों ने मातम किया।" ziyarat e nahiya in hindi
कर्बला के को विस्तार से जानने में।